Followers

Friday, 19 February 2016

तीसरा पहर




रात के तीसरे पहर
मैं
घबरा कर उठ गयी थी
छाती पर मानों कोई भारी सा पत्थर रखा हो
पानी की घूंट ली
फिर चौखट पर तेरे कदमों की आहट सी पायी
मैं स्तभ्द सी खड़ी रही
सोचती रही
तेरे कदमों की ही आहट थी
या उन यादों की
इन खयालो की रात बहुत लम्बी हो गयी
भोर के इंतज़ार में
न जाने मेरी कितनी नींदें उड़ गयी
उस पहर न जाने कितनी बार सांकल टटोली
पर तेरी मौजुदगी न पा कर
मैं समझ गयी
बिस्तर पर लौट गयी
अधमरी सी अचेत
चारों ओर का सूनापन बता रहा था
न इस चौखट से अब तेर कोइ वास्ता रहा
न ही इस गली को तू याद रख पाया
छाती पर पड़ा पत्थर मानो और भारी हो गया
और रात का वो तीसरा पहर
हमेशा के लिये
आज भी वैसा ही है
मेरे ज़हन में ज़िंदा
छाती पर भारी पत्थर के साथ
मुझे जगाये रखे !!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!!

No comments:

Post a Comment