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Monday, 7 September 2015

सिमट गयी



!!!!! लो.... सिमट गयी मैं ......और,,, छोड़ गयी अपना.... बहुत कुछ तुझ में
ढूँढ लेना जब ज़रुरत पड़े , कहीं तुझ में ही मिलूंगी मैं ....!!!!!!!! नीलम

Sunday, 6 September 2015

तेरा चातुर्य



तेरे ऐसा होने के कल्पना भी न की थी
तूने प्यार का अपने चातुर्य से जो प्रदर्शन किया था
आज किसी नाटक से कम नहीं लगता..................
मुझे जी भर के पा कर ,
तेरा जी इतनी जल्दी भर जाएगा
इसकी कल्पना भी न की थी ....................
तेरा ऐसा हो जाने की भी तो कल्पना न की थी
प्यार कुछ नहीं बस एक भ्रम है
समझा दिया तूने..........
सर्वस्व लुटा जो ...... आँखें मूँद..... तेरे पीछे चल पडी थी मैं
आज समझ आया ... तेरे उस चातुर्य का प्रदर्शन ,
तूने पा तो लिया इस देह को
और ........ जकड भी लिया मुझे अपने मोहजाल में
पर न पा पाया .......... मेरी आत्मा को
बंधी तो हूँ आज तुझसे
पर कोसों दूर हूँ तुझसे
तेरा होना ..... अब पल पल बताता है मुझे
तेरा फरेबी होना
तेरे ऐसे होने की तो कल्पना भी न की थी मैंने .........!!!!!!!
नीलम

शब्द



मेरे शब्द सुन्दर और सजे हुए नहीं
पर कोशिश की है की साफ़ और सरल हों
बनावटी लोगों और शब्दों से मन घबराता है
इस दो मुखी चेहरे वाली दुनिया कि चाहतें
मानो आत्मा के पवित्र रूप को पहचानने से इनकार कर रहे हों
वो शब्द जो अन्दर ही अन्दर एक ताना बना बुनते हैं
उनकी सफाई जुबां तक आते आते क्यों गन्दगी से भर जाती है
और वही सरल और सुन्दर शब्द कठिन और अभद्र हो जाते है
क्या मन की भाषा दिमाग को समझने में कठिन लगती है
या मन के शब्द सरलता से पहुँच ही नहीं पाते मुख्य तक
क्यों दिल की जुबां बेजुबान है
और जिव्य्हा उस से रुष्ट
क्या मेरा साफ़ और सरलता से बोलना इतना भयावह है
की लोग समझना ही नहीं चाहते या समझ कर दूर भागते हैं
क्या मेरी आत्मा की सरलता किस के प्रेम के योग्य नहीं
या मेरा कुछ कहना व्यर्थ ही है
सुन कर भी अनसुना कर देने वाले ये दो मुखी चेहरे
क्या कभी समझ पायेंगे अपनी और मेरी आत्मा की इस पवित्रता को 

...... नीलम

बंधन मेरा तेरा



तुम और मैं, कितने अलग होकर भी
आज कितने समान हैं
तुम भी मेरी इच्छा से भरे हो, और, मेरी चाहत भी तुम्हारे लिए उतनी ही मज़बूत
मेरा, तुमसे अलग होना, या, तुम्हारा, मुझ से
शायद, मायने ही नहीं रखता
बस, मेरा तुम में और तुम में मेरा हो जाना ही
हमारी पहचान है
तुम और मैं कितने अलग है
पर कुछ तो है, जो जोड़ रहा है
इस मैं और तुम को,
तभी तो, न, तुम मैं पर अटके हो और न मैं मैं करती हूँ
अब मैं और तुम हम जो हो गए हैं
आत्मा का मिलन कहो या शरीर का
बंध तो आज गए हैं
मैं और तुम
बस ये बंधन निर्मोही न हो
और बंधे रहे मैं और तुम
जीवन भर..................नीलम