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Friday, 25 September 2015

ये खिड़की ये द्वार



ये घर ये मकान
उनकी छतें और दीवार
खिड़कियाँ और द्वार
कहते हैं बार बार
हम ही हैं तेरे संगी तेरे साथ
कहाँ जायेगी किसी को ना पाएगी
करते तेरा इंतज़ार
खड़े मिलेंगे यहीं हम हर बार
नहीं है दुनिया तेरी बाहर
क्यूँ तू लड़ती हमसे और जाती हार
हम दीवारें और द्वार
खड़े हैं संभाले तुझे
मत जा छोड़ हमें
कोई नहीं है बाहर जो करता हो तेरा इंतज़ार
तू पागल दीवानी सी
ढून्ढती है जिसे बार बार
ना आयेगा लेने तुझे कभी इस द्वार
खिड़की भी कहती अब ना तू झाँक
छत को भी न निहार
हमसे ही तू कर ले दो बात
कोई नहीं है बाहर जो करता हो तेरा इंतज़ार !!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!