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Friday, 20 November 2015

चूल्हा



चूल्हा जला और बुझा
धुंआ और आग दोनों को देखा
खिचड़ी पकी भी और खाई भी गयी
चूल्हा पुता भी
गोबर की लिपाई भी हुयी
शुद्ध कर रसोई कई बार बनायी भी
रोटी पकाई और खिलाई भी
धुंए ने आँखें जलाई भी
पेट की आग कई बार भुझायी भी
चूल्हे ने ज़रुरत थी पेट की समझाई भी
चूल्हा जला और बुझा
कईयों बार बस पुता हुआ चुप चाप सोया भी
फुंकनी की फूंक से बुझते बुझते बचा भी
गोबर के उपले भी मिले
कभी बस अखबार और कागज़ जले
दोनों पहर भी न जाने कितनी बार पकाया
कभी खाली बर्तन की खनक से सुलाया भी
चूल्हा जला और बुझा
आग भी देखी और धुंआ भी !!!!!!!!!!!

पहेली



पहेली जैसी ज़िन्दगी और सफ़र के ये अंधे मोड़
न जाने आगे किस से टकराना होगा
कोई बड़ी गाडी होगी या
कोई खाली अँधा मोड़ !!!!
कितनी पहेलियाँ होंगी और न जाने कितने हल
किसी खम्बे के नीचे बैठ के सोचूंगी
या किसी पुल के निचे से गुज़ुरुंगी
कोई सड़क सीधी भी होगी
या उन मोड़ो पर अंधी सी मैं खड़ी रहूंगी
ज़िन्दगी का हर मोड़ तो तय है
जैसे हर बस का सफ़र और मंजिल
पर रस्ते की खबर नहीं
कब कौन सा मोड़ कहाँ ले जाए और मंजिल कैसे मिल जाए
सच है
ज़िन्दगी एक पहेली ही तो है
जवाब पता होते हुए भी ढूंढना कठिन है
अंधे मोड़ों से भरा ये सफ़र ही तो है
जो शायद ले जा रहा है पहेली सुलझाने
और मैं भी चलती जा रही हूँ अंधी सी
कभी गुज़रती पुल से तो कभी थक के रुक जाती खम्बे के नीचे !!!!!!!!!!  नीलम !!!!!!!!!!!!!

ये पल



जानती हूँ ये जो एक एक पल है
नहीं लौटेगा कभी
और न ही लौटेगा तू कभी
तेरा एक बार वापस मुड जाना
छोड़ जाएगा अकेला मुझे
मैं फिर शायद चल पडू अकेली
पर हर ये पल जो तेरे साथ जीया है मैंने
याद आएगा मुझे हर घड़ी
खबर है मुझे तू हो जाएगा किसी और का जल्द ही
और मैं , मेरा होना शायद याद ही न रहे तुझे कभी
पर ये जो पल जी रही हूँ संग तेरे
क्या तू जी पायेगा उसके साथ कभी
कर पायेगा प्यार मुझ सा तुझे कोई कभी
या तू हो पायेगा किसी और का जैसे मेरा है अभी
मेरी ज़िंदगी का हर पल अब तेरा है
तेरा होना ही अब मेरा जीवन है
न जाने जब तू लौटेगा
मेरी साँसों का थमना कैसा होगा
हो सके तो न जाना तू
रोकूंगी नहीं ये भी जानता है तू
बस एक कोशिश करना
मेरे संग बीते हर पल को याद रखना
मैं उम्र भर रहूंगी तेरे आस पास
जब मन चाहे तू लौट आना
पायेगा खुद के लिए वही एहसास !!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!!

सर्द मौसम



मौसम बदल रहा है
और मिजाज़ भी
हल्की ठण्ड जहाँ शरीर में सिरहन पैदा कर रही है
वहीँ तुम्हारा चुप रहना मेरे मन को चीरे जा रहा है
सर्द मौसम की शुरुआत में मानो
तुम्हारी गर्माहट भी कम होती जा रही है
ठंडी हवाएं भी शुरू हो गयी
और तेरी दूरियां भी बढ़ती जा रही हैं
मैं न तो इस बदलते मौसम को रोक पा रही हूँ
और न ही तुझे थाम पा रही हूँ
न जाने क्यों एक एहसास है कहीं
सर्दी के बढ़ते बढ़ते जहाँ एक ओर कोहरा जमने लगेगा
वहीँ तेरे और मेरे बीच भी एक गहरा धुंधलापन सा छा जाएगा
जैसे किसी पर्वत पर बर्फ का गिरना होगा
वैसी ही तू भी शायद जमता चला जाएगा
नहीं पता था कि ऐसा एहसास हमारी पहली सर्दी ही मुझे करवाएगी
मैं तो उस ठण्ड के इंतज़ार में थी
जहाँ तेरी गर्माहट मुझसे लिपटेगी
जहाँ तू रजाई सा मुझे ओढ़ नींद में भी मुझे अपनी साँसों की गर्मी से संभाले होगा
न जाने कैसे तू इतना दूर हो गया
कैसे ये आने वाली सर्दियां भी तेरे बिछड़ने की दस्तक दे रही हैं
और मैं अभी से कांप रही हूँ उस जाड़े की सुबह को सोच कर
जहाँ तू बर्फ सा मेरे पास तो होगा
पर सूरज कि तरह कहीं बहुत दूर शायद दिखाई भी न पड़ेगा  !!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!