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Thursday, 17 December 2015

पिता



पिता एक स्तम्भ है
पिता ही परमेश्वर
घर का अस्तित्व
एक वट वृक्ष है
मेरा साहस
मेरा रक्षक
मेरा पालनहार
मेरा अभिमान है
एक वरदान मेरे पिता
घर की धड़कन
मेरे भगवान मेरे पिता
कभी खट्टा कभी खारा
कभी प्यार की मीठी थपकी मेरे पिता
मेरा आसमान है
मेरी छत
मेरा आसरा
मेरा सम्मान
मेरी शक्ति है
मेरे होने की अभिव्यक्ति है
पिता मेरा जीवन है...... !!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!
ये छाया बनी रहे , यों ही पापा की ऊँगली मुझे चलने के लिए मिलती रहे..... wish you a very happy birthday  PAPA… !!!!

Wednesday, 16 December 2015

संगतराश



संगेमरमर सी देह सौम्य, लालसा से भरी
खोजती निरंतर एक संगतराश.....
जो सजाएगा, देगा रूप, बनाएगा
जो इसे सुरूप.....
वो करेगा नक्काशी इस पर
नाज़ुक सी देह को निखारेगा
कहीं घड़ेगा कोई कहानी
कहीं पिरोयेगा माया जाल
संगेमरमर सी देह महकेगी भी उसके हाथों
निरंतर उसे सजाएगा
जीवित सचेत परिपूर्ण
रश्मि सी चमकेगी, साँस लेती.......
सरोज अधरों से संगतराश को पुकारती
इक दिन .....
संगेमरमर सी सौम्य, लालसा से भरी.... देह महकेगी !!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!!

Sunday, 13 December 2015

हवन






हवन की अग्नि की तरह उस हवन कुंड में
जल जल शुद्ध होती मैं
हवा में महकती उस हवन की खुशबू की तरह
मेरी देह भी महकती रहती
कईयों की भक्ति बनती मैं
स्वाहा होती न जाने कितने हाथों से मैं
जल जल शुद्ध होती मैं
न जाने कितने मन्त्रों में बंधी
न जाने किस किस के मतलब के लिए जली
अच्छाई बुराई दोनों के लिए स्वाह हुयी मैं
कभी साधुवाद पाती तो कभी श्रद्धा नमन
हवन की अग्नि की तरह उस हवन कुंड में
जल जल शुद्ध होती मैं !!!!!!!!!! नीलम !!!!

Friday, 20 November 2015

कंकड़ पत्थर



आँख में कंकड़ सा चुभा था कुछ उस दिन
बस आंख मसली और लगा निकल गया
क्या पता था
आँख का कंकड़ अब पत्थर बन पूरे शरीर को छील देगा
खूब रगडा मसला भी खुद को
पर पत्थर ने पूरे शरीर के साथ साथ आत्मा को भी पथरा डाला
वो कंकड़ कुछ साल पहले आँखों में खूब पानी भर गया था
और आज पत्थर बन आँखों की झील को सुखा गया
कुछ पल के लिए एक एहसास दे गया था नाज़ुक सी इन आँखों में दर्द का
और अब दर्द बन इन आँखों में ही बस गया
कोशिश हज़ार की , कि निकल जाए मेरी आँखों से अब और न सुजाये
पर अब तो आँखें पथरा गयी और कंकड़ पत्थर बन गया
मसलते मसलते न जाने कितने साल यूँ ही गुज़र गए
पर इसके पत्थर हो जाने का एहसास आज हुआ
जब कोशिश की दो बूँद निकले
तो आँखें भी धोखा दे गयी
बारिश सी बरसती थी जो आँखें
आज अकाल पडी ज़मीं सी सूखी पड़ी हैं
न दुखी हैं न सुखी
न आंसू गम के बहाती न हंसी से बहती
मौसम बदले सावन से पतझड़ तक
पर पथराई से इन आँखों में पड़े कंकड़ ने कुछ मेहसूस ही न होने दिया
कुछ साल पहले जो कंकड़ चुभा था आँखों में आज पत्थर बन बस गया !!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!