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Tuesday, 12 January 2016

याद



  याद

उस सूर्य कि तरह दूर से तपिश देता
कभी अपनी गर्मी से झुलसा देता
और कभी जाड़े की दोपहर में
गर्माहट से मुझको सुला देता
पूनम के उस चाँद की तरह
कभी प्यार की उस रात की याद दिला जाता
और कभी अपनी चांदनी में नहला
सुकून की रात दे जाता
टिमटिमाते तारों की तरह
कभी इधर उधर से निकल आता
और कभी किसी टूटते तारे सा
कहीं गहरे आसमान में खो जाता
मुझे याद है तेरा होना
और होकर भी न होना
आज बस एक याद है तू
पर फिर भी
आस पास मेरे संसार में जिंदा है तू
सोचती हूँ कितनी ही बार
कंही तुझे भी होता होगा
कभी मेरे भी होने का एहसास
क्यूंकि जिंदा तो मैं भी हूँ आज !!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!

एक दर्द उठा




  एक दर्द उठा

रात भर जब आँख न लगी
दीवारों से बात करते करते जब रौशनी हुयी
तिलमिलाती सी खुद को संभाले
मैं बिस्तर से उठी
सूजी आँखें, निढाल बदन
सूखा मुंह और प्यासी जुबान
न कोई था पुकारने को
न हाथ थाम संभालने को
अकस्मात जब गिर पडी
ज़ख़्मी सी जब पडी रही
कुछ दिखाई ही न दिया
लाखों ख्याल आये
कई बार हाथ हिला किसी को बुलाये
कहने को तो कई प्रिय हैं
और कई अपने हैं
पर न जाने किसी को कह ही न पायी अपना हाल
कभी कहने से डरती
तो कभी कह के भी चुप हो जाती
गिरती पड़ती संभाले खडी हूँ खुद को
फिर मुस्कुराते हुए
उन्ही के लिए जो न जान पायेंगे कभी
की इक दर्द भी उठा था मुझे कभी.......... नीलम .........

मेरी सिगरेट



   मेरी सिगरेट

मेरी उँगलियों में जल कर
मेरी उँगलियों में ही बुझ जाती
मेरी सबसे प्रिय बन लबों से भी टकरा जाती
और निराकार हो राख बन झड़ जाती
मेरे दर्द में
मेरी ख़ुशी में
मेरे चिंतन में
हर बार मेरी उँगलियों को गर्माहट दे जाती
तुम्हे बुरा भला सब कहा
किसी ने कभी कभी न कभी छुटकारा पाने को भी कहा
पर अंत होने कि क्रिया को
तुझसे बेहतर कोई न समझा पाया
तुम बुरी हो या भली
नहीं जानती
मुझे जीवित रखे हो या नष्ट कर रही हो
नहीं समझ पाती
पर हाँ तुम हो तो कई दर्द पी गयी
तेरे संग न जाने कितने ही पल जी गयी
रात के घने अन्धकार में
मेरी उँगलियों में टिमटिमाती
न जाने तुम कितनी बातें कर गयी
कातिल बन कर भी
तुम कई बार जीवन दान बन गयी ............ नीलम ...........

Sunday, 3 January 2016

मुसाफ़िर



ए खुदाया उलझन है एक मन में
करम कर मुझ पर मौला
लगता है मेरे बुझने की घड़ी आ गयी
एक फ़रियाद है मेरी  
अब तो इस मांझी को पार लगा 
तूफानों में जून्झती इस कागज़ की नाव को
किसी किनारे तू लगा
ये मुसाफिर फिर रस्ता भूल गयी
हर लहर से टकराई पर समंदर की गहराई भूल गयी  
अब अपने साथ होने की आहट भी सुना
तेरी शमा कहीं इर्द गिर्द मुझे तू दिखा
तेरे दर पर आयी थी इक बार
झोली तूने भर दी थी मेरी
फिर इक बार रहमत बरसा
अश्क न छीन यों देकर आसरा
हार गयी हूँ लड़ते लड़ते
अपने जिस्म की ही परछाइयों से
दरिया के शोर में इन परछाइयों से मुझे तू बचा
मैं जान कर भी अनजान हूँ तेरी कुदरत से
इल्म है कि रात गुज़र जायेगी
पर न जाने तेरे चराग की ये बढ़ती लौ
किस घड़ी बुझ जायेगी
आज मुझे तू इस कशमकश ए दहर से आज़ाद करा   !!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!