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Thursday, 14 January 2016

ख्वाब


   ख्वाब

बुनते उधड़ते न जाने ज़हन में कब पलते
ये ख्वाब रोज़ न जाने कहाँ से पनपते
कभी दिल कभी दिमाग पर ऐसे हावी होते
रु ब रु सच्चाई से होने ही न देते
उन्हीं ख़्वाबों में से एक
मेरा ख्वाब तू भी है
सच्च नहीं है पर तू है जो मेरा जीना है
घर की घंटी के बजते ही तुझे देखना
रसोई में पूड़ियाँ तलते भी तुझे सोचना
अलमारी से रोज़ कपडे निकाल बिखेरना
काजल को मोटा कभी पतला लगा तुझे रिझाना
हैरान हूँ खुद से
सोचा ही न था ख्वाब को ऐसे जीना
तेरे होने का एहसास
और तेरे चले जाने का भी ख़याल
है मेरे मन में
तू एक चपल चुलबुला सा
पलक पर बैठा है अभी
न जाने कब किसी और की पलक पर जा बैठे
तू एक ख्वाब है
न जाने  कब किस कि नींद में जाग बैठे
मुझे भी जागते हुए सोना सिखा दिया
तूने न जाने कैसे ख्वाब को हकीकत बना दिया
मालूम है मुझे
दर्द भी पता है
सुन्दर से ख्वाब के टूटने का डर भी है मुझे
फिर भी न जाने कितनी रातें
इस ख्वाब के इंतज़ार में जगने की चाह भी है मुझे......!!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!!!

खाली स्थान



  खाली स्थान

एक दायीं तरफ एक बाईं तरफ मुंह पलटाये
बिस्तर के अलग अलग छोर पर
सर को तकिये में छुपाये
आपस के खाली स्थान को कभी जान ही न पाए
साथ रहते रहते भी फासले इतने हो गए
कि बिस्तर के बीच न जाने कैसे
और कब खाली स्थान पड गए
कभी भरने की न सोच पाए
कभी पहचान ही न पाए
बस पड़े रहे मुंह पलटाये
थके हारे अपनी ही जिंदगी की दौड़ में
जाने कब कदम इनके लडखडाये
न वो संभले न ये संभल पाए
बस हर पल खाली स्थान बढ़ाये
आज भी एक ही घर है इनका
एक ही छत के नीचे रहते
वही कमरा वही रसोई
और आज भी साथ ही खाते
मगर आपस में अब
बची न कोई कहने को बात
टीवी के चैनल बदलते
कभी फ़ोन पर घंटो दफ्तर में बात करते  
न जाने कब रात के अँधेरे में
आँख मूँद बिना मिले ही सो जाते
सुबह उठ.... भागते से
फिर लड़ने नयी लड़ाई निकल जाते
पर आपस के खाली स्थान को कभी भर ही न पाते ..... नीलम .......

बेहोश


   बेहोश

बेहोश सी मैं
चेतना में भी अचेत
सूखे गले से पानी को ताकती
किसी कूएं में जा गिरने के ख्याल से डर जाती
बेहोश सी मैं
थकी हुयी बिस्तर को ताकती
फिर किसी चिता में जल जाने के डर से भागती
चेतनाशुन्य
भूख से तिलमिलाती
रोटी को खाने के लिए हाथ बढाती
फिर किसी का शिकार होने से घबरा जाती
बेहोश सी मैं
न जाने क्यूँ चेतना में भी अचेत सी पडी रह जाती ............ नीलम.............




Tuesday, 12 January 2016

लड़ रही हूँ



लड़ रही हूँ

सुबह से जागी हूँ
कई ख़याल हैं
आते जाते
कभी तुझसे दूर होने का सोचती
तो कभी तुझे माफ़ ही कर देती
तू अल्पकालिक है
जानते हुए भी
तुझ से दूर होने के लिए
एक अंतर्द्वंद चल रहा है
एक भावना की अभिव्यक्ती बन
जूझ रहा है
कहीं किसी कोने में
तेरा होना मुझे अखर रहा है
और कहीं से आवाज़ आ रही
तुझे अपने आप से जोड़े रखने के लिए
सुबह से जागी
बस खयालों में ही लड़ रहीं
कभी खुद से
कभी तुझ से
और कभी उस भावना से ....... नीलम ........