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Thursday, 17 December 2015

सर्द रात



काला घना अँधेरा
सफ़ेद धुआं
लम्बा सा रास्ता
ठिठूरती सी रात
वहीँ कहीं किनारे जलती वो आग
कांपते हाथ सिकते साथ
न होंठ कुछ कहते
न कहती कुछ वो रात
न आँखें कुछ देख पाती
न रास्ता आगे बढ़ पाता  
न बढ़ती वो रात
धुंधला सा सब चारों ओर
सर्द हवा का शांत सा शोर
हड्डियों की खनखनाहट
कहीं दांत किटकिटाते
और वहीँ कहीं दूर न जाने कितने बेघर
सड़कों पर रात गुज़ारते
सर्द रातों की भूख मिटाते
थाम ले ये ठिठुरते बदन
ओढा दे गर्माहट का कम्बल
जाड़े की काली रात में दे दे थोडा साथ....!!!!!! नीलम !!!!!!!!

पिता



पिता एक स्तम्भ है
पिता ही परमेश्वर
घर का अस्तित्व
एक वट वृक्ष है
मेरा साहस
मेरा रक्षक
मेरा पालनहार
मेरा अभिमान है
एक वरदान मेरे पिता
घर की धड़कन
मेरे भगवान मेरे पिता
कभी खट्टा कभी खारा
कभी प्यार की मीठी थपकी मेरे पिता
मेरा आसमान है
मेरी छत
मेरा आसरा
मेरा सम्मान
मेरी शक्ति है
मेरे होने की अभिव्यक्ति है
पिता मेरा जीवन है...... !!!!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!
ये छाया बनी रहे , यों ही पापा की ऊँगली मुझे चलने के लिए मिलती रहे..... wish you a very happy birthday  PAPA… !!!!

Wednesday, 16 December 2015

संगतराश



संगेमरमर सी देह सौम्य, लालसा से भरी
खोजती निरंतर एक संगतराश.....
जो सजाएगा, देगा रूप, बनाएगा
जो इसे सुरूप.....
वो करेगा नक्काशी इस पर
नाज़ुक सी देह को निखारेगा
कहीं घड़ेगा कोई कहानी
कहीं पिरोयेगा माया जाल
संगेमरमर सी देह महकेगी भी उसके हाथों
निरंतर उसे सजाएगा
जीवित सचेत परिपूर्ण
रश्मि सी चमकेगी, साँस लेती.......
सरोज अधरों से संगतराश को पुकारती
इक दिन .....
संगेमरमर सी सौम्य, लालसा से भरी.... देह महकेगी !!!!!!!!!! नीलम !!!!!!!!!!!!

Sunday, 13 December 2015

हवन






हवन की अग्नि की तरह उस हवन कुंड में
जल जल शुद्ध होती मैं
हवा में महकती उस हवन की खुशबू की तरह
मेरी देह भी महकती रहती
कईयों की भक्ति बनती मैं
स्वाहा होती न जाने कितने हाथों से मैं
जल जल शुद्ध होती मैं
न जाने कितने मन्त्रों में बंधी
न जाने किस किस के मतलब के लिए जली
अच्छाई बुराई दोनों के लिए स्वाह हुयी मैं
कभी साधुवाद पाती तो कभी श्रद्धा नमन
हवन की अग्नि की तरह उस हवन कुंड में
जल जल शुद्ध होती मैं !!!!!!!!!! नीलम !!!!