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Friday, 11 September 2015

क्यूँ ?????



क्यूँ तुम मेरी हर सांस का हिसाब रखना चाहते हो , मेरे अस्तित्व पर भी उंगलियाँ उठाते हो , मेरे मेरा होने से घबराते हो, मेरी पहचान से क्या डरते हो, कहीं तुमसे आगे न बढ जाऊं क्या यही सोच सोच मुझे ठुकराते हो , सिर्फ एक वैजयंती की तरह रखते हो मुझ को , गले में अपने लटकाए क्यों घुमते हो मुझको ? कूड़ादान समझ क्यों फेंक देते हो हर कचरा अपने मन का मुझ में ........क्या सिर्फ यही है वजूद मेरा, न समझा तुमने मुझको कभी अपना बस गन्दगी से भरे पैर पोंछ दिए मुझको पायदान समझ घर का.... और आज भी बस अपनी हर गलती का दोश मंध्ते हो मेरे ही सर ..... तुम्हारे लिए परेशान होती हूँ तो कह देते हो क्यों नहीं जीने देती ? तुम्हारी खुशियों को बाटूं तो कहते हो.... तुमने थोड़े न दे दी.....फ़ोन की घंटी पर दौड़ते हो ऐसे जैसे पकड़ी गयी तुम्हारी कोई चोरी, न मैं हूँ तुम्हारी और न हो तू मेरे...फिर क्यूँ ये नाटक रचाया ....मुझ को क्यूँ कठपुतली की तरह नचाया ?हर वक़्त बस चाहते थे एक नौकरानी ही तो तुम, बस जानना चाहती हूँ क्या ज्यादा है उसमे और क्या मुझ में है कम ? तुम्हे तुम्हारी आजादी है अपनों से प्यारी तो मेरे गले में क्यों बंधन की रस्सी डाली ? मुझको स्वंतत्र कर जाओ जी लो अपनी ज़िंदगी, जी सकूँ मैं भी ताकि ज़िन्दगी जो है मेरी बाकी !!!!!! नीलम !!!!!

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